कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढ़ै बन माँहि ।
ऐसैं घटि घटि राँम है, दुनियाँ देखै नाँहि ।।
बिरह भुवंगम तन बसै, मंत्र न लागै कोइ ।
राम बियोगी ना जिवै, जिवै तो बौरा होई ।।
निम्नलिखित काव्यांश (दोहों) को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के सर्वाधिक उपयुक्त विकल्पों का चयन कर लिखिए :
Generated by claude-sonnet-4-6 · 2026-06-15 10:17 · grounding stimulus+chapter
Model Answer
(i) (A) जो परमात्मा के प्रेम में डूबा है।
(ii) (D) हर घड़ी
(iii) (D) परमात्मा से विरह की अनुभूति होना
(iv) (C) कथन सही है, लेकिन कारण, कथन की गलत व्याख्या करता है।
(कथन सही है — परमात्मा हर प्राणी के हृदय में है। परंतु कारण गलत है क्योंकि सांसारिक मोह-माया में लिप्त प्राणी इस सत्य से अनजान रहता है, सुपरिचित नहीं।)
(v) (D) राम से विरही व्यक्ति की स्थिति विक्षिप्तों जैसी हो जाती है।
(दोहे के अनुसार राम-वियोगी या तो जीता नहीं, और यदि जीता है तो बौरा — अर्थात् पागल — हो जाता है।)
Source: साखी – कबीर, स्पर्श (काव्य खंड)
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Explanation
- (i): दूसरे दोहे की अंतिम पंक्ति — "जिवै तो बौरा होई" — स्पष्ट करती है कि राम-वियोग में पागल हो जाने वाले को 'बौरा' कहा गया है।
- (ii): 'घटि घटि' का अर्थ है जीव मात्र / कण-कण / हर जगह। "हर घड़ी" (समय-सूचक अर्थ) यहाँ सही नहीं बैठता — यही गलत अर्थ है।
- (iii): 'भुवंगम' (सर्प) यहाँ विरह का प्रतीक है, न कि असली साँप। भाव है — परमात्मा के विरह की पीड़ा तन में बसती है।
- (iv): परीक्षक 'कारण' की जाँच करें — कबीर कहते हैं दुनिया देखती नहीं, अर्थात् माया में डूबा जीव अनजान रहता है। अतः कारण गलत है।
- (v): विकल्प (A) व (B) में अंतर है — (A) स्वाभाविक मृत्यु, (B) स्वेच्छा से। दोहा न तो मृत्यु की बात करता है, बल्कि विक्षिप्त (पागल) अवस्था की। अतः (D) सर्वाधिक उपयुक्त है।