अपने जीवन के सुख के क्षणों में कवि की ईश्वर से क्या अपेक्षा है ? 'आत्मत्राण' कविता के आधार पर लिखिए ।
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Model Answer
'आत्मत्राण' कविता में कवि सुख के क्षणों में ईश्वर से यह अपेक्षा रखता है कि वह नतमस्तक होकर प्रभु के मुख को पहचाने — अर्थात् सुख में भी ईश्वर को न भूले और उनके प्रति कृतज्ञता एवं भक्ति-भाव बनाए रखे।
Source: 'आत्मत्राण', प्रश्न-अभ्यास (ख)1 — नत शिर होकर सुख के दिन में / तव मुख पहचानूँ छिन-छिन में।
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Explanation
- परीक्षा में इस पंक्ति का सीधा संदर्भ देना आवश्यक है: "नत शिर होकर सुख के दिन में, तव मुख पहचानूँ छिन-छिन में।"
- मुख्य भाव: कवि दुःख में ही नहीं, सुख में भी ईश्वर को याद करना चाहता है — यही इस प्रार्थना की विशेषता है।
- 'नत शिर' = झुके हुए सिर से (विनम्रता/कृतज्ञता), 'छिन-छिन' = हर पल — इन शब्दों का अर्थ लिखने से अंक मिलते हैं।