कविता 'पर्वत प्रदेश में पावस' में झरने पर्वत के गौरव का गान कर रहे हैं क्योंकि वे पर्वत की ही संतान हैं और उसी की ऊँचाई से उत्पन्न होते हैं। पर्वत उनका आश्रयदाता है, इसलिए वे उसकी महिमा का बखान करते हैं।
झरने ऊँचाई से तेज़ गति से बहते हुए जब शोर मचाते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे वे पर्वत की स्तुति में मधुर संगीत गा रहे हों। कवि ने बहते हुए झरने की तुलना गाते हुए वीणा से की है, जो पर्वत के गौरवगान को और भी सजीव बना देती है।
Source: पर्वत प्रदेश में पावस, प्रश्न-अभ्यास (प्रश्न 7)
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