एकांकी के अंत में वज़ीर अली स्वयं कर्नल के खेमे में आकर उसे चकमा देता है और चालाकी से दस कारतूस हासिल कर लेता है। जब वह जाने लगता है तो अपना नाम "वज़ीर अली" बताकर कहता है कि उसने कारतूस दिए इसलिए जान बख्शी करता हूँ। यह साहस, निडरता और चतुराई देखकर कर्नल हक्का-बक्का रह जाता है। लेफ्टिनेंट के पूछने पर कर्नल दबी ज़बान से कहता है — "एक जाँबाज़ सिपाही।" शत्रु की सेना के खेमे में घुसकर कारतूस माँगना और जीवित निकल जाना वज़ीर अली की अदम्य वीरता का प्रमाण था, इसीलिए कर्नल उसकी प्रशंसा करता है।
Source: कारतूस (एकांकी), chapter 14
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