बढ़ती हुई आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किए गए मानवीय क्रियाकलापों ने प्रकृति को नकारात्मक रूप में प्रभावित कर उसे असंतुलित किया है । प्रकृति के इस असंतुलन का मानवीय जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा है ? 'अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले' पाठे के संदर्भ में लिखिए ।
Generated by claude-sonnet-4-6 · 2026-06-15 10:17 · grounding rag
Model Answer
मानवीय क्रियाकलापों — जैसे बड़े-बड़े भवनों का निर्माण, समुद्र को पीछे धकेलना, जंगलों की कटाई — से प्रकृति का संतुलन बिगड़ गया है। इसके परिणामस्वरूप:
- तापमान में वृद्धि हुई और बाढ़ व भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाएँ बढ़ीं।
- असमय वर्षा और तूफ़ान आने लगे।
- पशु-पक्षियों के आवास नष्ट हो गए और मानव जीवन भी छोटे-छोटे घरों में सिमटने लगा।
- प्रकृति के इस असंतुलन ने मानव के स्वास्थ्य, सुरक्षा और शांति को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित किया।
Source: 'अब कहाँ दूसरे के दुख से दुखी होने वाले', लिखित (ख)
Explanation
परीक्षक यहाँ पाठ के आधार पर प्रकृति के असंतुलन के मानव-जीवन पर प्रभाव (न केवल पर्यावरण पर) पूछ रहे हैं। मुख्य बिंदु: प्राकृतिक आपदाएँ, जीवन का सिकुड़ना, पशु-पक्षियों का विस्थापन और उसका मानव पर असर — ये सब लिखना आवश्यक है। उत्तर पाठ के संदर्भ में ही रखें।